पंतनगर: मस्जिद कॉलोनी और अवैध बस्तियों पर प्रशासन की नज़र

पंतनगर: मस्जिद कॉलोनी और अवैध बस्तियों पर प्रशासन की नज़र

पंतनगर की पहचान और वर्तमान चुनौती

उत्तराखंड का पंतनगर शहर अपनी गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यह शहर न केवल कृषि शिक्षा का केंद्र है बल्कि अपनी प्राकृतिक हरियाली और सुंदरता के लिए भी जाना जाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से यहाँ की कई बस्तियाँ प्रशासनिक कार्रवाई के दायरे में आ गई हैं।, जो स्थानीय निवासियों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

उजड़ने के डर से दहशत में बस्तीवासी

एयरपोर्ट विस्तार और भूमि अधिग्रहण

सूत्रों के मुताबिक पंतनगर एयरपोर्ट के विस्तार के लिए हाल ही में हल्दी क्षेत्र की भूमि का अधिग्रहण किया गया। इसके बाद अब नज़र मस्जिद कॉलोनी, संजय कॉलोनी और बाल्मीकि कॉलोनी जैसी बस्तियों पर है, जिन्हें अवैध घोषित कर हटाने की तैयारी चल रही है। प्रशासन का कहना है कि सार्वजनिक उपयोग और विकास कार्यों में बाधा डालने वाले अतिक्रमण को हटाना ज़रूरी है। वहीं इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के सामने भविष्य को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।

अतिक्रमण क्या है?

अतिक्रमण का मतलब है सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर बिना वैध अनुमति के अवैध कब्ज़ा करना या उसका दुरुपयोग करना।

अतिक्रमण की श्रेणी में आने वाली गतिविधियां

सार्वजनिक स्थानों पर अवैध कब्ज़ा:

  • फुटपाथों पर दुकान, ठेला या झुग्गी लगाना
  • सड़कों पर स्थायी निर्माण या व्यापारिक गतिविधि
  • नालों और जल निकासी मार्गों को बंद करना या उन पर निर्माण
  • सार्वजनिक पार्कों में अवैध निर्माण या व्यापारिक उपयोग
  • खाली सरकारी प्लॉटों पर झुग्गी-झोपड़ी या अन्य निर्माण
  • रेलवे ट्रैक के पास या सरकारी भूमि पर अवैध कब्ज़ा

उजड़ने के डर से दहशत में बस्तीवासी

पंतनगर एयरपोर्ट के विस्तार को लेकर स्थानीय बस्तियों में गहरी नाराज़गी और डर दिखाई दे रहा है। कॉलोनी में रह रहे परिवारों का कहना है कि वे पिछले 40–50 सालों से यहाँ बस गए हैं और अपने खून-पसीने से मकान बनाए हैं। अब प्रशासन की ओर से बार-बार सर्वे और मापी की जा रही है, जिससे यह आशंका बढ़ गई है कि जल्द ही उनके मकान तोड़े जा सकते हैं। प्रशासन की ओर से अतिक्रमण हटाने की बढ़ती चर्चा ने यहाँ के हजारों परिवारों की रातों की नींद उड़ा दी है। गलियों में बातचीत का मुख्य विषय अब केवल एक ही है – “कल क्या होगा?”

लोगों की बातें

  • स्थानीय निवासी: “हम यहाँ पीढ़ियों से रह रहे हैं। अचानक अब यह कहना कि यह जमीन एयरपोर्ट या यूनिवर्सिटी की है, हमारे लिए समझ से बाहर है। अगर घर टूटे तो बच्चों की पढ़ाई और परिवार का भविष्य बर्बाद हो जाएगा।”
  • एक अन्य परिवार: “नोटिस तक नहीं दिया गया, लेकिन बार-बार अधिकारी मापी करने आ रहे हैं। हमें सिर्फ़ उजाड़ने की तैयारी दिख रही है।”
  • बुज़ुर्ग निवासी: “पहले भी एयरपोर्ट का विस्तार दूसरी ओर किया गया था। वहाँ मंदिर और श्मशान था, इसलिए हमें नहीं हटाया गया। अब अचानक हमारी बस्तियों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है?” 
  • महिलाओं की बेबसी: घर उजड़ने के डर से महिलाएँ सबसे ज़्यादा परेशान हैं। उनका कहना है कि गरीब परिवारों के लिए नया घर बनाना या किराए पर रहना नामुमकिन है।

“हमने अपनी पूरी ज़िंदगी यहीं गुज़ारी है। अब इस उम्र में कहाँ भटकेंगे?”
“हमारे बच्चों की पढ़ाई छिन जाएगी, रोज़गार रुक जाएगा और सिर से छत चली जाएगी—हम कहाँ जाएंगे?”

मोहल्लेवासियों की फरियाद, नेता ने दिलाया भरोसा

अतिक्रमण हटाने की आशंका से चिंतित मोहल्लेवासियों ने हाल ही में श्री राजेश शुक्ला जी से मुलाक़ात कर अपनी समस्याएँ साझा कीं। लोगों ने कहा कि अचानक कार्रवाई से उनके परिवार और बच्चों का भविष्य संकट में आ जाएगा।
राजेश शुक्ला ने निवासियों की बातें धैर्यपूर्वक सुनीं और उन्हें घबराने के बजाय हिम्मत बनाए रखने की सलाह दी। उन्होंने आश्वासन दिया कि वह प्रशासनिक अधिकारियों से मिलकर इस मामले को उठाएँगे।

समर्थन और माँग

स्थानीय लोगों ने पूर्व विधायक राजेश शुक्ला और रुद्रपुर के मेयर विकास शर्मा से समर्थन लिया है। दोनों नेता डीएम से मिलकर समस्या को उठाने पहुँचे। जनता की साफ़ माँग है कि या तो उन्हें उनके घरों से न हटाया जाए या फिर पुनर्वास की ठोस व्यवस्था की जाए।
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