Israel-Gaza: ट्रंप की बयानबाज़ी और क़तर की मध्यस्थता ने इज़राइल पर डाला असर

Israel vs Gaza

इज़राइल बनाम ग़ज़ा: ट्रंप की पॉलिटिक्स और क़तर की कूटनीति ने बढ़ाया तनाव

Israel और Gaza के बीच जारी संघर्ष फिर एक नए मोड़ पर पहुँच गया है, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की धमकी, हमास की रणनीतिक प्रतिक्रिया, क़तर की भूमिका और अरब देशों की नीतियों ने पूरी तस्वीर को बेहद पेचीदा बना दिया है। कल रात (3-4 अक्टूबर, 2025) की घटनाओ ने पूरे मिडिल ईस्ट में हलचल मचा दी। ट्रंप के अचानक बयान, हमास की प्रतिक्रिया और इज़राइली मीडिया में मचे हाहाकार ने इस संघर्ष को एक नया राजनीतिक रंग दे दिया है।

ट्रंप का धमकी भरा बयान

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने ट्वीट के ज़रिये धमकी भरे अंदाज में कहा कि “अगर Sunday तक 36 घंटे के अंदर सारे hostages रिहा नहीं होते तो वो कर देंगे जिसकी कल्पना भी मुश्किल है।” इस धमकी से इज़राइल confident में आया कि अगर हमास मानता नहीं है तो नेतन्याहू को ग़ज़ा में खुला खेल खेलने की छूट मिल जाएगी। इसका सीधा असर इज़राइल के अखबारों और समर्थकों में देखा गया।

 

हमास की नई रणनीति

लेकिन हर किसी की उम्मीदों के विपरीत, हमास ने ट्रंप के इस बेस को “negotiations शुरू करने का शानदार base” कहते हुए उसका स्वागत किया। साथ ही, अरब और मुस्लिम देशों को धन्यवाद दिया और international community की ceasefire demand की सराहना की, लेकिन आँख बंदकर ट्रंप के सभी proposals को स्वीकार नहीं किया। इस प्रतिक्रिया का इज़राइल में अर्थ निकला कि हमास ने ट्रंप की शर्तों को ठुकरा दिया, अब 36 घंटों के बाद इज़राइल को ग़ज़ा में military action की पूरी छूट मिल सकती है।

ट्रंप का बयान और इज़राइली असमंजस

ट्रंप ने हमास के बयान को word by word अपने सोशल मीडिया पर शेयर किया और इज़राइल को बमबारी रोकने के लिए कहा। मशहूर इज़रायली पत्रकार बराक राबविट ने भी कहा कि नेतन्याहू और इज़राइल administration सदमे में हैं क्योंकि उनकी डील पर हमास तैयार नहीं हुआ और ट्रंप के दबाव में फौरन ceasefire लागू करवाया गया।

पर्दे के पीछे क्या चल रहा है?

अरब और मुस्लिम मुल्कों ने जो ceasefire proposal बनाया गया था और जिसे ट्रंप ने भी मंजूरी दी थी , उसमें नेतन्याहू ने अपने हिसाब से कई बड़े बदलाव करवा लिए। सबसे shocking बात थी ग़ज़ा के core zone में इज़रायली army की स्थायी presence और एक नया corridor, जो ग़ज़ा की जमीन को छोटा और संकरा कर देता। जाहिर है ग़ज़ा की आबादी और हमास इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकते थे।

अरब देशों और क़तर की भूमिका

मूल प्रस्ताव तैयार करने वाले मुल्क—पाकिस्तान, सऊदी अरब, क़तर, जॉर्डन, इंडोनेशिया आदि—ने नए ड्राफ्ट का स्वागत तो किया, लेकिन अन्दर ही अन्दर असंतोष पनप गया। क़तर ने इस पूरे conflict में एक कूटनीतिक masterstroke खेला। क़तर के साथ अमेरिका ने special agreement किया कि अगर क़तर पर कोई हमला हुआ तो अमेरिका उसे सीधे अपनी सुरक्षा के तौर पर मानेगा। वहीं ट्रंप ने खुद अपने सामने इज़राइल से क़तर के मामले में माफी मंगवाई और executive order निकाल दिया कि क़तर पर किसी भी तरह का हमला अमेरिका पर हमला माना जाएगा। इससे हमास को भी राहत मिली कि जो उनके लोग क़तर में रह रहे हैं, उन पर कोई attack नहीं होगा।

जनता और राजनेताओं की नाराजगी

अमेरिका और इज़राइल की वैश्विक इमेज को भी बड़ा धक्का लगा है। सुरक्षा परिषद (UNSC) में पिछली ceasefire वोटिंग के दौरान अमेरिका अकेला पड़ गया था; उसके साथ मुश्किल से तीन देश ही थे। अब अमेरिकी आवाम और administration दोनों में यह बहस गर्म है कि आखिर ट्रंप और पूरी सरकार इज़राइल के हाथों की कठपुतली क्यों बन गई है? MAGA और ट्रंप समर्थक टकर कालसन जैसे बड़े पत्रकार भी इसपर सवाल उठा रहे हैं।

आगे का रास्ता और संभावित समझौता

अब scenario इस मोड़ पर आ गया है कि हमास के पास ज्यादा options नहीं हैं। क़तर में shelter लिए उनके नेता अमेरिका-इज़राइल की इच्छा के खिलाफ नहीं जा सकते, वरना उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। दूसरी ओर, ग़ज़ा के नागरिक जंग से परेशान हो चुके हैं। सम्भवत: टेबल पर back door negotiation से कोई “decent deal” बन सकती है, जिसके तहत ग़ज़ा की सीमाओं से इज़राइली सेना एक time frame में हटेगी, और हमास को limited तरीके से हथियार रखने की अनुमति दी जाएगी।

नेतन्याहू की राजनीति और मिडिल ईस्ट की आगे की दिशा

Israel vs gaza

नेतन्याहू के लिए जंग जीवित रहने का जरिया है—अगर संघर्ष खत्म होता है तो आंतरिक विरोध से उनकी कुर्सी भी जा सकती है। इज़राइल अगर ईरान पर हमला करने की सोचता है तो मामला और गंभीर हो सकता है, क्योंकि सऊदी, क़तर या अरब मुल्क खुलकर उनके साथ नहीं आ सकते। फिलहाल राहत की बात है कि ग़ज़ा पर हमला momentarily रोक दिया गया है और नागरिक थोड़ा सुकून अनुभव कर सकते हैं। लेकिन असली समाधान तभी आएगा जब फिलस्तीन को स्वतंत्रता और statehood मिलेगी, वरना मिडिल ईस्ट में शांति केवल एक temporary illusion ही बनी रहेगी।

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